NEWS PR डेस्क: पटना, 08 जून। बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री पद पर नियुक्ति अब कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। उनकी नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसके बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने शीर्ष अदालत में दायर अपनी याचिका में कहा है कि दीपक प्रकाश वर्तमान में न तो बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। इसके बावजूद उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जिसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान गैर-विधायक को मंत्री बनाए जाने की अनुमति जरूर देता है, लेकिन इसके लिए निर्धारित अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी संवैधानिक प्रावधान के आलोक में दीपक प्रकाश की नियुक्ति की समीक्षा की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह इस नियुक्ति की संवैधानिक वैधता की जांच करे और आवश्यक निर्देश जारी करे।

उधर, बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए द्वारा घोषित उम्मीदवारों की सूची में दीपक प्रकाश का नाम शामिल नहीं किया गया है। इससे उनके राजनीतिक भविष्य और मंत्री पद पर बने रहने को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। खुद दीपक प्रकाश भी यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे विधान परिषद चुनाव के लिए नामांकन दाखिल नहीं करेंगे। ऐसे में उनके मंत्री पद की स्थिति को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। विपक्षी दल लंबे समय से गैर-विधायक को मंत्री बनाए जाने के मुद्दे पर सरकार को निशाना बनाते रहे हैं और अब उन्हें सरकार पर हमला करने का नया अवसर मिल गया है।
फिलहाल सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत का फैसला न केवल दीपक प्रकाश के मंत्री पद के भविष्य को प्रभावित कर सकता है, बल्कि संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को भी स्पष्ट कर सकता है।
