Jitiya Vrat 2026: जितिया व्रत में क्या करें और क्या नहीं? जानें पूजा सामग्री, कथा और पारण

Rashmi Tiwari

NEWS PR डेस्क : Jitiya Vrat 2026: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से माताएं आज जितिया व्रत रख रही हैं। इसे जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत खासतौर पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत मां और संतान के बीच अटूट प्रेम और ममता का प्रतीक है। इस दिन माताएं भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की लंबी आयु, निरोगी जीवन और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है इस व्रत को काफी कठिन माना जाता है, ।
तीन दिनों तक चलता है जितिया व्रत
जितिया व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि से होती है। पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा निभाई जाती है। इस दिन व्रती महिलाएं स्नान आदि के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अष्टमी तिथि को मुख्य व्रत रखा जाता है। अष्टमी के दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं। यानी पूरे व्रत के दौरान अन्न के साथ पानी का भी त्याग किया जाता है। इसी दिन भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद नवमी तिथि को व्रत का पारण किया जाता है। पूजा-अर्चना और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं अन्न-जल ग्रहण कर व्रत समाप्त करती हैं।
2026 में कब होगा जितिया व्रत का पारण?
इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर 2026 से शुरू होकर 4 अक्टूबर 2026 को पारण के साथ पूरा होगा। दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, व्रत की अवधि 3 अक्टूबर सुबह 6:15 बजे से 4 अक्टूबर सुबह 6:15 बजे तक बताई गई है। 4 अक्टूबर 2026 को सुबह 6:15 बजे के बाद पारण किया जा सकेगा। पारण के दौरान क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी और तोरई यानी नेनुआ की सब्जी ग्रहण करने की परंपरा भी बताई जाती है।
जितिया व्रत की पूजा सामग्री
परंपरा के अनुसार पूजा में कुश से बने भगवान जीमूतवाहन, गाय का गोबर और चिकनी मिट्टी से बने चील-सियारिन के प्रतीक, लाल-पीला जितिया धागा या जिउतिया माला रखी जाती है। इसके अलावा कुश, दूर्वा, पान, सुपारी, आम के पल्लव और तुलसी दल भी पूजा में इस्तेमाल किए जाते हैं। पूजा की अन्य सामग्री में फूल-माला, रोली, अक्षत, पीला चंदन, सिंदूर, कलश और लाल कपड़ा शामिल हैं। वहीं फल और नैवेद्य के लिए खीरा, केला, सेब व अन्य मौसमी फल, कच्चा नारियल, पेड़ा और बताशा रखा जाता है। पारंपरिक भोग में भीगे हुए काले चने, मटर, तोरई यानी नेनुआ के पत्ते, मड़ुआ का आटा और नोनी का साग शामिल किए जाते हैं।
कैसे की जाती है भगवान जीमूतवाहन की पूजा?
जितिया व्रत के दिन व्रती महिलाएं स्नान के बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करती हैं। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन का प्रतीक स्थापित कर पूजा की जाती है। बता दें कि जितिया व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच प्रेम, ममता और समर्पण से जुड़ी परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। कठिन निर्जला उपवास के जरिए माताएं अपनी संतान के स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं।
चील और सियारिन की कथा क्यों सुनाई जाती है?
जितिया व्रत से जुड़ी लोकपरंपराओं में चील और सियारिन की कथा का विशेष महत्व बताया जाता है। लोककथा के अनुसार, एक चील और सियारिन ने साथ में जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया। चील ने व्रत के नियमों का पालन किया, जबकि सियारिन भूख सहन नहीं कर सकी और उसने व्रत बीच में ही तोड़ दिया। लोकमान्यता के अनुसार, दोनों के व्रत के परिणाम अलग-अलग रहे। चील के बच्चे सुरक्षित और सुखी रहे, जबकि सियारिन के बच्चों के साथ अनहोनी हुई। इसी कथा के माध्यम से व्रत में श्रद्धा, संयम और नियमों के पालन का महत्व बताया जाता है।

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