अजगैबीनाथ धाम का रहस्य: महंतों के देवघर जाने पर क्यों प्रभावित होती है आंखों की रोशनी?

Shreya Raj
अजगैबीनाथ धाम: गंगा तट पर आस्था का अद्भुत संगम।

NEWS PR डेस्क : भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित प्राचीन अजगैबीनाथ धाम आस्था, इतिहास और रहस्य का अनोखा संगम है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर विशाल ग्रेनाइट की चट्टान पर बाबा अजगैबीनाथ का मंदिर स्थित है। सावन के महीने में यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाने से पहले बाबा अजगैबीनाथ पर जल अर्पित करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

महंतों के देवघर जाने को लेकर है खास मान्यता

अजगैबीनाथ धाम से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में यहां के महंतों का देवघर नहीं जाना भी शामिल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अजगैबीनाथ मठ का कोई महंत अगर देवघर जाने की कोशिश करता है तो उसकी आंखों की रोशनी प्रभावित होने लगती है। इसी वजह से मठ के महंत देवघर जाने से परहेज करते हैं।

अजगैबीनाथ मठ के वर्तमान महंत प्रेमा नन्द गिरि के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना बताया जाता है। अब तक इस मठ में 18 महंत हो चुके हैं। मठ से जुड़ी मान्यता के अनुसार, शुरुआती दौर में महंत सिद्धार्थ नाथ भारती और केदारनाथ प्रतिदिन गंगा से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर जाया करते थे।

भगवान शिव ने ब्राह्मण के रूप में दिए दर्शन

मठ से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक दिन भगवान भोलेनाथ ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और दोनों महंतों के साथ देवघर की यात्रा पर चले। इस दौरान भगवान शिव ने उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप में दर्शन दिए।

कहा जाता है कि भगवान के दर्शन से अभिभूत दोनों महंतों ने शिव से उनके चरणों में स्थान देने की प्रार्थना की। इसी मान्यता से जोड़कर अजगैबीनाथ मंदिर के मुख्य शिवलिंग के पास दो अन्य शिवलिंगों की स्थापना की बात कही जाती है।

सिद्धार्थ नाथ भारती और केदारनाथ के बाद नहीं गए कोई महंत

महंत प्रेमा नन्द गिरि के अनुसार, सिद्धार्थ नाथ भारती और केदारनाथ के बाद किसी भी महंत ने देवघर जाने का प्रयास नहीं किया। मठ में यह मान्यता लंबे समय से चली आ रही है कि महंतों का देवघर जाना उचित नहीं है।

महंत प्रेमा नन्द गिरि खुद भी इस मान्यता से जुड़ा अपना अनुभव बताते हैं। उनके अनुसार, उन्होंने एक बार देवघर जाने की कोशिश की थी। इसके बाद उनकी आंखों की रोशनी कम हो गई। वह इस घटना को अजगैबीनाथ धाम की परंपरा और मान्यता से जोड़कर देखते हैं।

अजगैबीनाथ धाम की पूजा परंपरा भी अलग

अजगैबीनाथ धाम की पूजा-पद्धति भी अपने आप में खास है। यहां सुबह की पूजा बाबा बैद्यनाथ के नाम से की जाती है। इसके बाद सरकारी पूजा संपन्न होने पर बाबा अजगैबीनाथ की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।

धाम की यह परंपरा अजगैबीनाथ और देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ के बीच धार्मिक संबंध की मान्यता को और मजबूत करती है। यही वजह है कि सावन में सुल्तानगंज से देवघर तक जाने वाले लाखों कांवड़ियों के लिए अजगैबीनाथ धाम विशेष महत्व रखता है।

आस्था, इतिहास और रहस्य का संगम

उत्तरवाहिनी गंगा के किनारे स्थित अजगैबीनाथ धाम न सिर्फ श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है, बल्कि इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इसे रहस्यमयी भी बनाती हैं। महंतों के देवघर नहीं जाने की परंपरा, भगवान शिव के ब्राह्मण रूप में दर्शन की मान्यता और मंदिर की अनोखी पूजा पद्धति इस धाम को दूसरे शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है।

सावन में जब लाखों कांवड़िए गंगा से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं, तब अजगैबीनाथ धाम में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। बाबा अजगैबीनाथ के प्रति लोगों की गहरी आस्था और सदियों पुरानी मान्यताएं इस प्राचीन शिवधाम की महिमा को और खास बना देती हैं।

भागलपुर से रिपोर्टर : श्यामानंद सिंह

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