जीविका से बदली बिहार की तस्वीर, 11.88 लाख स्वयं सहायता समूहों से महिलाओं को मिला आर्थिक संबल

Shreya Raj
जीविका से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं ने एकजुट होकर सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया।

NEWS PR डेस्क: पटना, 15 सितंबर 2026: बिहार में जीविका के माध्यम से महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं बचत, बैंकिंग, ऋण और स्वरोजगार के जरिए परिवार की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रही हैं। खेती, पशुपालन, सिलाई, भोजन निर्माण और छोटे कारोबार से जुड़कर महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं।

11.88 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं

वर्ष 2006 में शुरू हुई जीविका परियोजना आज बिहार के गांव-गांव तक पहुंच चुकी है। वर्तमान में राज्य में 11.88 लाख स्वयं सहायता समूह, 73,517 ग्राम संगठन और 1,684 संकुल स्तरीय संघ गठित हैं। इन संस्थाओं ने महिलाओं को आर्थिक सहयोग देने के साथ अपनी बात रखने और निर्णय लेने का मंच भी दिया है।

महिलाओं की आर्थिक यात्रा छोटी-छोटी बचत से शुरू हुई थी। अब स्वयं सहायता समूहों की साप्ताहिक बचत 2,693 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है वहीं, सामुदायिक निवेश निधि के रूप में करीब 13,590 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं।

बैंक सखियों ने आसान की वित्तीय सेवाएं

राज्य में 6,749 बैंक सखियां ग्रामीण महिलाओं को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इनके माध्यम से हर वर्ष 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का डिजिटल वित्तीय लेन-देन हो रहा है। इससे बैंकिंग सुविधाएं गांवों तक पहुंची हैं और महिलाओं की वित्तीय निर्णयों में भागीदारी बढ़ी है।

खेती और दुग्ध उत्पादन में भी महिलाओं की भागीदारी

जीविका से जुड़ी 46.89 लाख से अधिक महिला किसान आधुनिक और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपना रही हैं। इसके अलावा 61 महिला-नेतृत्व वाली किसान उत्पादक कंपनियां महिलाओं को सामूहिक उत्पादन और बाजार से जोड़ रही हैं।

दुग्ध क्षेत्र में कौशिकी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी प्रतिदिन 35 हजार से अधिक महिला दुग्ध उत्पादकों से लगभग 80 हजार लीटर दूध एकत्र कर रही है। इससे ग्रामीण महिलाओं को संगठित बाजार तक पहुंच मिल रही है।

रसोई, सिलाई और रोजगार से मजबूत हो रही पहचान

सरकारी अस्पतालों और अन्य संस्थानों में संचालित 330 जीविका दीदी की रसोई महिलाओं के लिए रोजगार और सेवा का माध्यम बनी हैं वहीं, ‘जीविका दीदी का सिलाई घर’ के जरिए 50 लाख से अधिक आंगनबाड़ी बच्चों के लिए पोशाक की आपूर्ति की गई है।

सतत् जीविकोपार्जन योजना के तहत 2 लाख से अधिक अत्यंत निर्धन परिवारों को आजीविका गतिविधियों से जोड़ा गया है। इनमें करीब 1.75 लाख परिवार क्रमिक रूप से गरीबी से बाहर निकलने में सफल हुए हैं।

महिला रोजगार योजना से मिली आर्थिक मदद

मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 1.68 करोड़ से अधिक महिलाओं को 10-10 हजार रुपये की प्रारंभिक सहायता दी गई है। उद्यम की स्थापना और प्रदर्शन के आधार पर अब 2.10 लाख रुपये तक की सहायता देने की दिशा में काम हो रहा है। योजना की दूसरी किस्त के तहत 27 अगस्त को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक लाख लाभुकों को 20 हजार रुपये प्रति लाभुक की दर से राशि अंतरित की थी।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में महिला श्रमबल भागीदारी वर्ष 2017-18 के करीब 3-4 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2024-25 में लगभग 20 प्रतिशत हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 33.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह बदलाव बताता है कि अवसर, पूंजी और बाजार मिलने से महिलाएं परिवार के साथ-साथ पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं।

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