सरायकेला राजवाड़ी में 16 दिनों तक दुर्गा पूजा, सदी पुरानी परंपरा आज भी कायम

Jyoti Sinha
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झारखंड के सरायकेला जिले की राजवाड़ी दुर्गा पूजा अपनी विशेष परंपराओं के लिए जानी जाती है। यहां मां दुर्गा की आराधना लगातार 16 दिनों तक होती है। पूजा की शुरुआत जिउतियाष्टमी की रात से होती है और इसका समापन महाष्टमी पर किया जाता है।राजमहल के भीतर स्थित मां पाउड़ी मंदिर में जिउतिया से लेकर षष्ठी तक पूजा संपन्न होती है।

षष्ठी के दिन राजा और राजपरिवार के सदस्य खरकई नदी के तट पर शस्त्र पूजा करते हैं। इसके बाद राजमहल के सामने बने दुर्गा मंदिर में माता का आह्वान कर बाकी दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। इस पूरे समय मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है।नवपत्रिका और नुआखाई का आयोजनपूजा के दौरान राजवाड़ी में नवपत्रिका दुर्गा पूजा का भी आयोजन होता है। सदियों पुरानी इस परंपरा को वर्तमान राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव, रानी अरुणिमा सिंहदेव और राजपरिवार के अन्य सदस्य श्रद्धा और आस्था के साथ निभाते हैं।नवमी के दिन यहां नुआखाई का आयोजन होता है। इस अवसर पर नई फसल से बने चावल का भोग मां पाउड़ी को अर्पित किया जाता है। इसके बाद राजपरिवार प्रसाद ग्रहण करता है।

मंदिर में आज भी पारंपरिक ड्रेस कोड है – महिलाओं को केवल साड़ी और पुरुषों को धोती-गमछा पहनकर ही प्रवेश की अनुमति है।400 साल से जारी है परंपराराजपरिवार की मानें तो 1620 में राजा विक्रम सिंह ने सरायकेला रियासत की स्थापना के साथ ही इस पूजा की शुरुआत की थी। तब से लेकर अब तक सिंह वंश की 64 पीढ़ियां मां दुर्गा की पूजा करती आ रही हैं। स्वतंत्रता के बाद भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया गया और आज मौजूदा राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव उसी आस्था और निष्ठा से इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव का कहना है कि जिउतियाष्टमी से लेकर महाष्टमी तक दुर्गा पूजा की परंपरा उनकी रियासत में सदियों से चली आ रही है और आज भी हर कार्यक्रम ठीक वैसे ही होता है, जैसे राजघराने के दौर में हुआ करता था।

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