खराब हेयरकट पर 2 करोड़ का दावा, सुप्रीम कोर्ट ने 25 लाख में निपटारा करने को कहा

Neha Nanhe
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NEWS PR डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने मॉडल आशना राय को मिले खराब हेयरकट मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा दिए गए 2 करोड़ रुपये के मुआवजे को घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया है। अदालत ने कहा कि हर्जाना केवल भावनात्मक आधार या अनुमान पर तय नहीं किया जा सकता, बल्कि वास्तविक नुकसान का ठोस सबूत होना जरूरी है। यह फैसला ITC मौर्य होटल के सैलून से जुड़े विवाद में आया है।

क्या सिर्फ एक खराब हेयरकट किसी व्यक्ति को करोड़ों रुपये का मुआवजा दिला सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर साफ-साफ जवाब दिया—“नहीं।” अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कथित नुकसान का ठोस, प्रमाणित और विश्वसनीय सबूत नहीं दिया जाता, तब तक इतनी बड़ी रकम का हर्जाना नहीं मिल सकता।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि करोड़ों रुपये का मुआवजा केवल भावनात्मक तर्क, अनुमान या दावों के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए वास्तविक नुकसान का ठोस और प्रमाणिक आधार होना अनिवार्य है | न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने 34 पन्नों के फैसले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा मॉडल आशना राय को दिए गए 2 करोड़ रुपये के मुआवजे को घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया।

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अदालत ने यह भी कहा कि इतनी बड़ी राशि तय करने के मामले में आयोग का कर्तव्य था कि वह साक्ष्यों का गंभीर परीक्षण करे और स्पष्ट करे कि वास्तविक नुकसान की गणना किस आधार पर हुई। केवल सामान्य चर्चाओं या फोटोकॉपी दस्तावेजों के आधार पर इतनी बड़ी रकम निर्धारित नहीं की जा सकती।असल मामला वर्ष 2018 का है। मॉडल और मैनेजमेंट प्रोफेशनल आशना राय दिल्ली स्थित ITC मौर्य होटल के सैलून में हेयरकट के लिए गई थीं।

उनका आरोप था कि स्टाइलिस्ट ने उनकी मांग से अधिक छोटे बाल काट दिए, जिससे उन्हें मानसिक आघात हुआ और पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचा। उन्होंने दावा किया कि इस घटना के कारण उन्हें माडलिंग और फिल्म उद्योग के कई बड़े असाइनमेंट खोने पड़े।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने सेवा में कमी मानते हुए उन्हें दो करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी मुआवजे की राशि पर पुनर्विचार करने को कहा था, लेकिन अप्रैल 2023 में आयोग ने दो करोड़ रुपये का ही आदेश जारी किया। इसके बाद ITC लिमिटेड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही उपभोक्ता आयोगों पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) सख्ती से लागू नहीं होती, फिर भी प्रमाणों का ठोस मूल्यांकन अनिवार्य है। मानसिक आघात का हवाला देकर मूल दस्तावेज प्रस्तुत न करना भारी मुआवजे का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग ने यह साबित नहीं किया कि दो करोड़ रुपये का मुआवजा वास्तविक आर्थिक नुकसान के अनुरूप कैसे है।

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