दिल्ली में ‘डील’ या सियासी दबाव? उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी RLM के BJP में विलय की अटकलों से बिहार NDA में भूचाल

Asha Rai
File Photo
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NEWS PR डेस्क: राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच दिल्ली में हुई एक मुलाकात ने बिहार की राजनीति का पारा चढ़ा दिया है। राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा का दिल्ली पहुंचना और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनकी बैठक कई राजनीतिक संकेत दे रही है। सूत्रों के मुताबिक देर रात उनकी मुलाकात केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा नेतृत्व के साथ हुई, जिसमें बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और राज्यसभा चुनाव को लेकर गहन चर्चा हुई।

हालांकि, न तो राष्ट्रीय लोक मोर्चा की ओर से और न ही भाजपा की तरफ से किसी संभावित विलय को लेकर आधिकारिक बयान आया है, लेकिन सियासी गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। खासकर तब, जब राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव होने जा रहा है और गठबंधन के भीतर संतुलन साधना NDA की प्राथमिकता बन गया है।

राज्यसभा गणित और NDA की रणनीति:

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बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य हैं और राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार को जीत के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास फिलहाल इतनी संख्या है कि वह चार सीटें आराम से जीत सकता है। लेकिन पांचवीं सीट के लिए समीकरण चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में सहयोगी दलों को संतुष्ट रखना NDA के लिए रणनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।

सूत्रों की मानें तो उपेंद्र कुशवाहा ने भाजपा से पूर्व में हुए वादों का हवाला देते हुए राज्यसभा की एक सीट पर अपनी दावेदारी पेश की है। साथ ही, उन्होंने अपने बेटे दीपक प्रकाश के लिए विधान परिषद की सीट की भी मांग रखी है। चर्चा यह भी है कि वे राज्यसभा चुनाव अपने दल के चुनाव चिह्न पर ही लड़ना चाहते हैं, न कि भाजपा के सिंबल पर। बताया जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर शीर्ष नेतृत्व को फिलहाल कोई आपत्ति नहीं है।

विलय की चर्चा क्यों?

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, बिहार भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भाजपा में विलय का प्रस्ताव भी रखा था। हालांकि फिलहाल इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि विलय का मुद्दा भविष्य की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने चार सीटें जीती थीं। संख्या भले सीमित हो, लेकिन गठबंधन की राजनीति में हर सीट का महत्व होता है। खासकर तब, जब 2026 के विधानसभा चुनाव और आगे की राष्ट्रीय राजनीति की तैयारी चल रही हो।

 ‘राजनीतिक पैकेज’ की चर्चा:

दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री हैं, लेकिन वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। उन्हें अब तक विधान परिषद नहीं भेजा गया है। ऐसे में राजनीतिक पैकेज की चर्चा भी जोर पकड़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विलय या दीर्घकालिक समझौता होता है, तो प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्ट फार्मूला सामने आ सकता है।

भाजपा की व्यापक रणनीति:

जानकारों का मानना है कि भाजपा का लक्ष्य केवल राज्यसभा की सीट सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि संगठनात्मक मजबूती भी है। यदि राष्ट्रीय लोक मोर्चा का विलय होता है, तो कुशवाहा का सामाजिक आधार सीधे भाजपा के साथ जुड़ सकता है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं और कुशवाहा समुदाय में उनकी पकड़ को भाजपा अपने पक्ष में जोड़ना चाहेगी।

संभावित विकल्प क्या?

1. उपेंद्र कुशवाहा को बिना शर्त राज्यसभा भेज दिया जाए और गठबंधन यथावत रहे।

2. भाजपा में विलय के बदले राज्यसभा और विधान परिषद में प्रतिनिधित्व तय हो।

3. भाजपा नया चेहरा उतारे, जिससे गठबंधन में असहजता पैदा हो सकती है।

फिलहाल इन तमाम अटकलों पर दोनों दलों की ओर से चुप्पी है। लेकिन इतना तय है कि दिल्ली में हुई यह मुलाकात महज औपचारिक नहीं थी। आने वाले दिनों में आधिकारिक बयानों और उम्मीदवारों की घोषणा के साथ तस्वीर साफ होगी। यह फैसला न सिर्फ उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक दिशा तय करेगा, बल्कि बिहार में NDA की आंतरिक राजनीति और भविष्य की रणनीति पर भी गहरा असर डालेगा।

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