पीएमसीएच की फर्श पर तड़पता मरीज, आधुनिक व्यवस्था पर भारी पड़ी संवेदनहीनता

Puja Srivastav
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News PR डेस्क: पटना स्थित पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) से सामने आई एक तस्वीर ने एक बार फिर बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत उगर कर दी है। देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में, जहां प्रदेशभर के गरीब, असहाय और लावारिस मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहीं संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के बीच गहरी खाई साफ दिखाई दे रही है।

सोमवार को गेट नंबर-2 के पास पुराने रजिस्ट्रेशन काउंटर और दुर्गा मंदिर के समीप एक बुजुर्ग मरीज को फर्श पर बैठा और लेटा हुआ देखा गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, यह मरीज पिछले 4-5 दिनों से वहीं पड़ा हुआ है। न उसके साथ कोई परिजन है, न ही उसे यह जानकारी कि इलाज कहां और कैसे मिलेगा।

प्रत्यक्षदर्शी रौशन कुमार ने बताया कि बुजुर्ग मानसिक रूप से अस्वस्थ प्रतीत होते हैं। “कई कर्मचारी रोज उन्हें देखते हैं, लेकिन कोई पूछने तक नहीं रुकता। कड़ाके की ठंड में वे जमीन पर ही सोते हैं। समय पर इलाज नहीं मिला तो कुछ भी हो सकता है,”

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न्यूज़ PR के रिपोर्टर ने भी मरीज से बात करने की कोशिश की, लेकिन वह अपना नाम-पता नहीं बता सका। कमजोरी और ठंड से जूझते इस बुजुर्ग की आंखों में बस एक ही उम्मीद थी, कोई आए और उसे इलाज तक पहुंचाए।

उधर, पीएमसीएच में करीब 5540 करोड़ रुपये की लागत से नए भवन और नई व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, अलग-अलग काउंटर और नई लोकेशन सिस्टम कागजों पर आधुनिक दिखते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ये गरीब और कम पढ़े-लिखे मरीजों के लिए भूलभुलैया बनती जा रही हैं। गेट नंबर-2 के पास पड़े मरीज को यह तक नहीं बताया गया कि उसे किस काउंटर या वार्ड में जाना है।

लावारिस मरीजों की जिम्मेदारी किसकी?

नियमों के अनुसार, अस्पताल प्रशासन को ऐसे मरीजों को प्राथमिक इलाज और आवश्यक मदद देनी चाहिए। लेकिन पुराने रजिस्ट्रेशन काउंटर और दुर्गा मंदिर के आसपास का इलाका लावारिस मरीजों का ठिकाना बनता जा रहा है, जहां न सक्रिय हेल्प डेस्क है, न कोई मार्गदर्शन करने वाला कर्मचारी

सबसे बड़ा सवाल यही है, जब अधिकारी ऊंची मंजिलों पर बैठकर योजनाएं बना रहे हैं, तो फर्श पर पड़े मरीज की सुनवाई कौन करेगा? क्या अस्पताल की व्यवस्था फाइलों और मीटिंगों तक सीमित रह गई है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नई व्यवस्था के साथ मजबूत हेल्प डेस्क, मरीजों की जागरूकता, और लावारिस मरीजों के लिए अलग टीम अनिवार्य है। संवेदना के बिना आधुनिकता अधूरी है, पीएमसीएच की पहचान सिर्फ विशाल इमारतों से नहीं, बल्कि वहां मिलने वाली इंसानियत और समय पर इलाज से बनेगी।

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