दिल्ली पुलिस की बहादुर एएसआई ज्योति बनीं मिसाल, 300 से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को परिवार से मिलाया

Neha Nanhe
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NEWS PR डेस्क : दिल्ली पुलिस की एएसआई ज्योति उन बहादुर अफसरों में से हैं, जिन्होंने अपने काम से खाकी वर्दी को नई पहचान दी है। मिशन मिलाप के तहत उन्होंने अब तक 300 से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को ढूंढकर उनके परिवारों से मिलाया है।

उनकी ड्यूटी सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक मिशन बन चुकी है। कभी किसी मास्क पहने अपहरणकर्ता का लगातार 16 घंटे तक पीछा करके बच्चे को सुरक्षित बचाना, तो कभी एक मासूम को खोजने के लिए पूरे 90 दिनों तक हार न मानना—ऐसे कई किस्से उनके साहस और समर्पण की मिसाल हैं।

खाकी वर्दी में छिपी यह कहानी सिर्फ बहादुरी की नहीं, बल्कि ममता, संवेदनशीलता और इंसानियत की भी है, जो किसी की भी आंखें नम कर सकती है और दिल में गर्व की भावना भर देती है।

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अक्सर जब हम मर्दानी या सिंघम जैसे नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में फिल्मों के हीरो-हीरोइन की छवि उभर आती है। लेकिन असली बहादुरी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी महिला पुलिस अधिकारी हैं, जिनकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से भी ज्यादा रोमांचक और भावनात्मक है। ये हैं दिल्ली पुलिस की असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर ज्योति, जिन्होंने अपनी सेवा और संवेदनशीलता से खाकी वर्दी के पीछे छिपे इंसानियत के चेहरे को नई पहचान दी है।

उनकी यह अनोखी यात्रा दिल्ली पुलिस की खास पहल “मिशन मिलाप” से शुरू हुई। इस अभियान का उद्देश्य उन बच्चों और बेसहारा लोगों को उनके परिवारों से मिलाना है, जो किसी कारण से अपनों से बिछड़ जाते हैं। शुरुआत में यह ज्योति के लिए सिर्फ एक जिम्मेदारी थी, लेकिन जब उन्होंने पहली बार एक मां को उसके खोए हुए बच्चे से मिलते देखा, तो यह काम उनके लिए एक जुनून बन गया। आज तक वह 300 से ज्यादा गुमशुदा बच्चों को उनके परिवारों तक पहुंचा चुकी हैं।

अपने करियर में ज्योति ने कई चुनौतीपूर्ण मामलों का सामना किया है। कोविड काल के दौरान एक महिला ने सरकारी मदद का झांसा देकर एक मां से उसका बच्चा छीन लिया था। आरोपी ने मास्क पहन रखा था, जिससे पहचान करना बेहद मुश्किल था। इसके बावजूद ज्योति ने सुबह 5 बजे से जांच शुरू की और बिना थके रात 9 बजे तक आरोपी का पीछा करती रहीं। आखिरकार वह आरोपी पकड़ा गया और बच्चा सुरक्षित मां की गोद में लौट आया।

एक अन्य मामले में उन्होंने एक बच्चे को ढूंढने के लिए लगातार 90 दिनों तक मेहनत की। मोबाइल डेटा, तकनीकी सुराग और अपने जमीनी नेटवर्क की मदद से उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार उस बच्चे को बरेली से बरामद कर उसके माता-पिता से मिला दिया। यह सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि एक तरह की तपस्या थी।

जब उनसे पूछा गया कि दिल्ली में इतने बच्चे क्यों गुम हो जाते हैं, तो उन्होंने बताया कि दिल्ली एक बड़ा माइग्रेशन हब है, जहां देशभर से लोग काम की तलाश में आते हैं। भीड़भाड़ और कभी-कभी लापरवाही के कारण बच्चे बिछड़ जाते हैं। हालांकि दिल्ली पुलिस की सतर्कता के कारण यहां शिकायत तुरंत दर्ज होती है, इसलिए आंकड़े ज्यादा दिखाई देते हैं, लेकिन बच्चों को ढूंढने की रफ्तार भी उतनी ही तेज है। उन्होंने उन गिरोहों को भी कड़ी चेतावनी दी, जो फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण करते हैं।

ज्योति बताती हैं कि पुलिस की नौकरी आसान नहीं होती। एक पुलिसकर्मी को अक्सर सिर्फ 6 से 7 घंटे की नींद ही मिल पाती है, और उसी के बीच उसे अपने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभानी होती हैं। लेकिन उनके मुताबिक, जब कोई बच्चा अपने माता-पिता से मिलकर मुस्कुराता है, तो सारी थकान पल भर में दूर हो जाती है।

आज एएसआई ज्योति न सिर्फ पुलिस विभाग बल्कि समाज की कई महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि असली “मर्दानी” बनने के लिए हथियारों की नहीं, बल्कि मजबूत इरादों, हिम्मत और ममता से भरे दिल की जरूरत होती है।

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