पटना कॉलेज में प्राचार्य नियुक्ति को लेकर उठे सवाल, नियुक्ति पर विवाद

Patna Desk
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बिहार की उच्च शिक्षा प्रणाली एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। इस बार विवाद का केंद्र बना है पटना विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित संस्थान पटना कॉलेज, जहाँ डॉ. अनिल कुमार को प्राचार्य बनाए जाने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।डॉ. अनिल कुमार की नियुक्ति को लेकर न सिर्फ चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर, बल्कि नियमों, योग्यता और संवैधानिक प्रावधानों पर भी गंभीर शंकाएँ जताई जा रही हैं। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने डॉ. कुमार का नाम रसायन विज्ञान के सहायक प्रोफेसर पद के लिए सुझाया था, लेकिन 24 मार्च को दस्तावेज़ सत्यापन के दिन वे उपस्थित नहीं हुए।

अब वही व्यक्ति राज्य के सबसे पुराने कॉलेज में प्राचार्य पद पर तैनात किए जा रहे हैं।डॉ. कुमार का कहना है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के झाँसी स्थित बिपिन बिहारी कॉलेज में 27 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया है और वे प्रोफेसर के पद तक पदोन्नत हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने एक साथ सहायक प्रोफेसर और प्राचार्य दोनों पदों के लिए आवेदन किया था, जबकि नियमानुसार कोई वरिष्ठ पद पर कार्यरत व्यक्ति कनिष्ठ पद के लिए तभी योग्य माना जा सकता है जब वह अपने वरिष्ठता के विवरण को छुपाए।इस नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पूर्व प्राचार्य तरुण कुमार और शिक्षाविद एन. के. चौधरी ने कहा है, “यदि कोई पहले ही प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है, तो वह सहायक प्रोफेसर जैसे कनिष्ठ पद के लिए कैसे उपयुक्त हो सकता है?” उनके अनुसार यह चयन नियमों और योग्यता की मूल भावना के विपरीत है।इसके अलावा, प्राचार्य पदों की नियुक्ति में लॉटरी प्रणाली का उपयोग कर कुलपतियों की भूमिका को दरकिनार कर दिया गया, जिससे कुलाधिपति और कुलपति के बीच अधिकारों को लेकर नया टकराव सामने आ गया है। इस पूरी प्रक्रिया ने विश्वविद्यालय प्रशासनिक ढाँचे और उच्च शिक्षा में पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर बहस को तेज कर दिया है।

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